The Life ManualTLM Basic

सप्ताह 3·दिन 20 (21 में से)

यात्रा का लक्ष्य

जीवन-यात्रा की महान परिणति

चरण 5 (7 में से) — मन को शुद्ध करना

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सप्ताह 3 — दिन 20 — शुरू करने से पहले

दिन 20 में आपका स्वागत है

यात्रा का अंत कुछ पाने में नहीं, पहचानने में होता है।

कल हमने वाहन का चौथा पहिया पूरा किया। आज हम थोड़ा पीछे हटकर पूरी यात्रा को देखते हैं: उसका लक्ष्य, वह आंतरिक शासन जिसे TLM का हर अभ्यास बनाता आ रहा है, और यह कि जिस परिपूर्णता को हम खोजते हैं, वह असल में कहाँ मिलती है। धीरे-धीरे, एक ही बैठक में पढ़ें, और अंत में दिए गए चिंतन के सवालों को अपने साथ रहने दें।

आज की रूपरेखा

  1. आरंभ — मानवता की सबसे पुरानी खोजपूरी जीवन-यात्रा, और वह क्षितिज जो लगातार आगे खिसकता रहता है।
  2. शिक्षा — भगवद्गीताअध्याय 5, श्लोक 21 और अध्याय 6, श्लोक 21: इंद्रियों से परे एक सुख।
  3. आंतरिक शासन और आंतरिक शासन के सात चरणपिछले बीस दिनों के हर अभ्यास के पीछे का एक ही उद्देश्य।
  4. तीन परतें और पाँच उपकरणबदलाव मुश्किल क्यों होता है, और TLM मन की हर परत तक कैसे पहुँचता है।
  5. रथ पर फिर से नज़र और 4-3-5 प्रणालीहर हिस्से का प्रशिक्षण: कई अभ्यास, एक बदलाव।
  6. आंतरिक शासन के साथ जीनाENA और EVA, दो पंख: नतीजों से और चुनावों से हमारा रिश्ता।
  7. महान परिणति, चिंतन और meditationअंतिम अंतर्दृष्टि; उज्जायी breathing और Loving-Kindness Meditation।
आपको चाहिए
  • पढ़ने के लिए एक शांत जगह, और चिंतन के खाली स्थानों के लिए एक पेन।
  • दिन 20 का meditation audio (15 मिनट)।
  • अंत में चिंतन के पाँच सवालों के लिए बिना जल्दबाज़ी के कुछ मिनट।
आपकी यात्रा पर एक टिप्पणी

जीवन व्यस्त हो सकता है। अगर ज़रूरी लगे तो 21 दिनों से ज़्यादा समय लें; जल्दबाज़ी की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर आप TLM Basic के अगले दिन पर न जा पाएँ, तो जो दिन आपने आखिरी बार पूरा किया था, उसी दिन के मूल्य, संकल्पित गतिविधि और meditation का अभ्यास करते रहें। जब आप तैयार हों, तो programme वहीं से फिर शुरू करें जहाँ आपने छोड़ा था।

आरंभ

मानवता की सबसे पुरानी खोज

एक पल रुककर उन चुनावों पर सोचें जो आपने जीवन भर किए हैं।
जीवन-यात्रा: चार पहियों वाले वाहन में बैठा यात्री, उगते सूरज की ओर जाती सड़क पर। पहिए हैं संबंध, पेशा और कार्य, वित्त, और मूल्य और नैतिकता।
चित्र 1हर यात्रा मन में एक मंज़िल लेकर शुरू होती है।

आपने पढ़ाई क्यों की?
आपने कड़ी मेहनत क्यों की?
आपने आर्थिक सुरक्षा क्यों चाही?
आपने संबंधों, उपलब्धि, मान-सम्मान या सफलता की चाह क्यों रखी?

हर व्यक्ति के जवाब अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उन सबकी तह में एक साझी चाह है।

हम सब अच्छी तरह जीना चाहते हैं। हम सब दुःख से बचना चाहते हैं। हम सब परिपूर्णता खोजते हैं।

इस course में पहले, दिन 3 में, हमने एक सरल लेकिन गहरा क्रम समझा था, जो कई ज्ञान-परंपराओं में मिलता है:

सुखशांतिआनंद

शुरुआत में ज़्यादातर लोग अनुकूल परिस्थितियों और सुखद अनुभवों के ज़रिए सुख खोजते हैं। जैसे-जैसे समझ गहरी होती है, यह खोज धीरे-धीरे उत्तेजना और सुख-भोग से हटकर आंतरिक शांति की ओर मुड़ जाती है। आगे और विकास होने पर एक कहीं ज़्यादा गहरी परिपूर्णता की संभावना खुलती है — एक ऐसी अवस्था, जिसे ज्ञान-परंपराएँ अक्सर आनंद कहती हैं।

इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। अगर सुख, शांति और आनंद मंज़िल हैं, तो हम उन्हें ठीक-ठीक कहाँ खोज रहे हैं?

ज़्यादातर इंसान सहज ही मान लेते हैं कि परिपूर्णता कहीं आगे है।

एक बेहतर नौकरी।
एक बेहतर संबंध।
ज़्यादा धन।
ज़्यादा मान-सम्मान।
एक ज़्यादा अनुकूल भविष्य।
कुछ ऐसा, जिसे अभी हासिल करना है। कुछ ऐसा, जिसे अभी पाना है।

जीवन-यात्रा का पूरा ढाँचा इसी सोच पर टिका है। यात्री चलता है। वाहन आगे बढ़ता है। मार्ग खुलता जाता है। लक्ष्य कहीं दूर दिखाई देता है।

लेकिन क्या हो, अगर यह सोच अधूरी हो?

क्या हो, अगर जिस परिपूर्णता को हम खोजते हैं, वह वहाँ न हो जहाँ हम सोचते हैं?
क्षितिज का पीछा, एक engraving: पीछे से दिखता एक यात्री हाथ में लाठी लिए एक खुले मैदान के पार घुमावदार सड़क पर चल रहा है। सड़क के किनारे मील के पत्थर खड़े हैं, हर अगला पिछले से छोटा: उपलब्धि, धन, मान-सम्मान, status और संपत्ति। जहाँ सड़क ओझल हो जाती है, वहाँ क्षितिज पर एक सुनहरा सूरज टिका है, जिसके चारों ओर हल्की टूटी रेखाओं वाले चाप हैं, जो एक के बाद एक और दूर होते जाते हैं: हर बार जब कोई मील का पत्थर आता है, क्षितिज थोड़ा और दूर दिखाई देता है। उपलब्धिधनमान-सम्मानStatusसंपत्ति क्षितिज का पीछा हर बार जब कोई मील का पत्थर आता है,क्षितिज थोड़ा और दूर दिखाई देता है।
चित्र 2दौड़ जारी रहती है, पर मंज़िल कभी आती नहीं दिखती।

यहीं ज्ञान-परंपराएँ एक बिलकुल अलग नज़रिया सामने रखती हैं।

यह पूछने के बजाय:मुझे सुख कैसे मिल सकता है?
वे पूछती हैं:जिस सुख की मुझे खोज है, उसका स्वरूप क्या है?
और वह कहाँ मिल सकता है?
शिक्षा — भाग 1

भगवद्गीता

सुख के बाहरी स्रोतों से आगे देखना

भगवद्गीता बार-बार हमें अपने सुख के स्रोत को परखने के लिए प्रेरित करती है।

हममें से ज़्यादातर लोग स्वाभाविक रूप से मानते हैं कि सुख अनुकूल परिस्थितियों, सुखद अनुभवों और सफल नतीजों से आता है। ये बेशक हमारी खुशहाली में योगदान देते हैं, फिर भी कृष्ण हमें और गहराई में देखने के लिए आमंत्रित करते हैं।

अध्याय 5, श्लोक 21 में वे कहते हैं:

भगवद्गीता 5.21बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्bāhya-sparśeṣv asaktātmā vindaty ātmani yat sukham“जो बाहरी संपर्कों में आसक्त नहीं होता, वह अपने भीतर सुख पाता है।”

यह एक गहरी बात है।

कृष्ण हमसे दुनिया को ठुकराने के लिए नहीं कह रहे। वे यह नहीं कह रहे कि उपलब्धि, संबंध या भौतिक खुशहाली महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि वे एक सीमा की ओर इशारा कर रहे हैं। जो कुछ भी पूरी तरह बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर है, वह बदलाव के आगे असुरक्षित बना रहेगा।

उपलब्धियाँ छिन सकती हैं।
संबंध बदलते रहते हैं।
स्वास्थ्य ऊपर-नीचे होता रहता है।
भाग्य चढ़ता-उतरता है।

अगर हमारा सुख सिर्फ़ इन्हीं बाहरी हालात पर निर्भर है, तो हमारा सुख अस्थिर ही रहेगा।

इसलिए गीता हमें खुशहाली के एक गहरे स्रोत को खोजने के लिए आमंत्रित करती है — ऐसा स्रोत जो पूरी तरह इस पर निर्भर नहीं है कि हमारे आस-पास क्या हो रहा है।

एक गहरी संभावना

फिर कृष्ण इस जिज्ञासा को और भी आगे ले जाते हैं। अध्याय 6, श्लोक 21 में, एक अनुशासित और चिंतनशील मन के फलों का वर्णन करते हुए, वे कहते हैं:

भगवद्गीता 6.21सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्sukham ātyantikaṃ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam“व्यक्ति उस परम सुख का अनुभव करता है, जो इंद्रियों से परे है और जिसे बुद्धि से ग्रहण किया जाता है।”

यह श्लोक एक अद्भुत संभावना सामने रखता है।

इंसान के लिए उपलब्ध सबसे गहरी परिपूर्णता शायद अपने स्वभाव में इंद्रियों से जुड़ी न हो। शायद वह चीज़ों का मालिक होने, उत्तेजना या उपलब्धि से पैदा न हो। शायद वह अनुभव के एक बिलकुल ही अलग पहलू से पैदा हो।

कृष्ण इसे ऐसे सुख के रूप में बताते हैं जो:

  • इंद्रियों से परे है
  • बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है
  • निखरी हुई बुद्धि से पहचाना जाता है

इससे तुरंत एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। कैसी बुद्धि ऐसी परिपूर्णता को पहचान सकती है?

निश्चित रूप से वह बुद्धि नहीं, जिसका ध्यान लगातार बँटा रहता है।
वह बुद्धि नहीं, जिस पर impulses हावी हों।
वह बुद्धि नहीं, जो reactivity और आदत में फँसी हो।

कृष्ण जिस बुद्धि का वर्णन करते हैं, वह होनी चाहिए:

  • स्पष्ट
  • अनुशासित
  • चिंतनशील
  • भावनात्मक रूप से संतुलित
  • तुरंत मिलने वाली तृप्ति से आगे देख पाने में सक्षम

और यहीं से हम सीधे TLM के केंद्रीय विचारों में से एक पर पहुँचते हैं।

शिक्षा — भाग 2

आंतरिक शासन

बुद्धि का निखार

पिछले बीस दिनों से TLM सिर्फ़ concepts नहीं सिखाता रहा है। वह मन का एक खास गुण विकसित करता रहा है।

एक ऐसा मन जो ज़्यादा जागरूक हो।
ज़्यादा संतुलित।
ज़्यादा चिंतनशील।
Impulse में आकर react करने के बजाय समझदारी से respond करने में ज़्यादा सक्षम।

TLM में हम इस क्षमता को आंतरिक शासन कहते हैं।

आंतरिक शासन

“दबाव में भी ध्यान, भावना और व्यवहार को regulate करने की अनुशासित क्षमता — व्यक्तिगत मूल्यों और संस्था के ethos के साथ alignment में, सोचे हुए लक्ष्य को पूरा करने के लिए।”

हमारे जीवन की quality अंततः हमारे आंतरिक शासन की quality पर निर्भर करती है।

आंतरिक शासन एक ऐसी बुद्धि को विकसित करना है, जो मन से control होने के बजाय मन को दिशा दे सके।

इस नज़रिए से देखें, तो TLM के अलग-अलग तत्व समझ में आने लगते हैं।

अभ्यास।
चिंतन।
मूल्य।
Meditations।
स्वास्थ्य, संबंधों, वित्त और उद्देश्य पर चर्चाएँ।

इन सबका रुख एक ही उद्देश्य की ओर रहा है: आंतरिक शासन का विकास।

आंतरिक शासन के सात चरण

पिछले बीस दिनों में हमने कई विचारों, अभ्यासों और नज़रियों को जाना है। पहली नज़र में ये अलग-अलग विषय लगे होंगे। असल में ये सब एक ही प्रक्रिया का हिस्सा थे: मन का कदम-दर-कदम प्रशिक्षण।

जैसे शारीरिक तंदुरुस्ती शरीर के व्यवस्थित प्रशिक्षण से विकसित होती है, वैसे ही आंतरिक शासन मन के व्यवस्थित प्रशिक्षण से विकसित होता है। इस यात्रा को आंतरिक शासन के सात चरणों के ज़रिए समझा जा सकता है।

आंतरिक शासन के सात चरण, बाएँ से दाएँ ऊपर चढ़ती पत्थर की सीढ़ी के रूप में: 1 मन को समझना, 2 मन को शांत करना, 3 ध्यान और एकाग्रता को साधना, 4 ध्यान को इच्छानुसार मोड़ना, 5 मन को शुद्ध करना, 6 मन का साक्षी बनना, 7 मन से परे जाना। चरण 1 से 4 पूर्ण हैं, चरण 5 जारी है, चरण 6 दिन 20 में आरंभ हो चुका है और चरण 7 भविष्य का क्षितिज है; “आप यहाँ हैं, दिन 20” वाला निशान वहाँ खड़ा है जहाँ चरण 6 शुरू होता है। चढ़ाई के साथ-साथ एक महीन सुनहरा तीर चलता है, जो बाल जितनी पतली रेखा से बढ़ते-बढ़ते पूरी मोटाई तक पहुँचता है: ऊपर चढ़ने के साथ बढ़ती स्पष्टता, स्वतंत्रता और निपुणता। चरण 1 समझें मन को पूर्ण चरण 2 शांत करें मन को पूर्ण चरण 3 साधें ध्यान और एकाग्रता पूर्ण चरण 4 मोड़ें ध्यान इच्छानुसार पूर्ण चरण 5 शुद्ध करें मन को जारी चरण 6 साक्षी हो देखें मन को आरंभ हो चुका चरण 7 पार करें मन को भविष्य काक्षितिज बढ़ती स्पष्टता, स्वतंत्रता और निपुणता आप यहाँ हैं दिन 20
चित्र 3आंतरिक शासन मन के कदम-दर-कदम प्रशिक्षण से विकसित होता है।
शिक्षा — भाग 3

मन की तीन परतें

यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है।

अगर स्थायी परिपूर्णता आंतरिक शासन पर निर्भर है, तो बदलाव अक्सर इतना मुश्किल क्यों होता है?

लोग यह समझते हैं कि क्या सही है, फिर भी उसके हिसाब से जीने में क्यों जूझते हैं?
अंतर्दृष्टियाँ कभी-कभी धुँधली क्यों पड़ जाती हैं, जबकि पुरानी आदतें बनी रहती हैं?

इसका जवाब इस बात में है कि मन कोई एक परत भर नहीं है। इंसान का अनुभव conditioning, जागरूकता और आदत के कई स्तरों से होकर चलता है। स्थायी बदलाव के लिए इन सभी परतों पर काम करना ज़रूरी है।

मन की तीन परतें, एक के ऊपर एक रखी तीन पट्टियों के रूप में: स्थूल (शरीर और व्यवहार), सूक्ष्म (विचार, भावनाएँ और ध्यान) और अवचेतन (conditioning और पहचान जोड़ लेना)। सूक्ष्म और अवचेतन पट्टियों के बीच एक टूटी रेखा उस हिस्से को दिखाती है जो सचेत जागरूकता से नीचे है। एक सुनहरा कोष्ठक तीनों परतों को जोड़ता है: स्थायी बदलाव को तीनों परतों तक पहुँचना होगा। मन की तीन परतें स्थूलसूक्ष्मअवचेतन शरीर और व्यवहारविचार, भावनाएँ और ध्यानConditioning और पहचान जोड़ लेना सचेत जागरूकता से नीचे स्थायी बदलाव कोतीनों परतों तकपहुँचना होगा
चित्र 4स्थायी बदलाव के लिए मन की सभी परतों के साथ काम करना ज़रूरी है।

आंतरिक शासन के सात चरण ठीक इसी समझ के साथ बनाए गए थे।

कुछ चरण सचेत मन को समझने और शांत करने में हमारी मदद करते हैं।
कुछ दूसरे चरण ध्यान और जागरूकता को मज़बूत करते हैं।
और कुछ अन्य चरण सचेत जागरूकता से नीचे बसे गहरे patterns को पहचानने और बदलने में मदद करते हैं।

जब बदलाव सिर्फ़ बौद्धिक समझ तक पहुँचता है और उन भावनात्मक patterns, आदतों और conditioning पर भी काम नहीं करता जो जागरूकता की सीधी पहुँच से बाहर काम करते रहते हैं, तब वह नाज़ुक बना रह सकता है।

सच्चा बदलाव तब होता है, जब अंतर्दृष्टि मन की तीनों परतों में उतर जाती है।

तभी नए मूल्य, आदतें और जीने के ढंग स्वाभाविक और टिकाऊ बनते हैं।

शिक्षा — भाग 4

बदलाव के पाँच उपकरण

मन की तीन परतों को समझ लेने के बाद, स्वाभाविक रूप से एक और सवाल सामने आता है।

TLM तीनों परतों पर एक साथ कैसे काम करता है? इसका जवाब उन पाँच दैनिक अभ्यासों में है, जो programme के हर दिन हमारे साथ रहे हैं।

ये पाँच तत्व यूँ ही नहीं चुने गए थे। TLM के ढाँचे में हर एक की अपनी अलग भूमिका है, और मिलकर ये पाँचों अभ्यास आंतरिक विकास को सहारा देने के पूरक तरीके सामने रखते हैं। मिलकर वे आंतरिक बदलाव की एक व्यापक प्रक्रिया बनाते हैं।

TLM के पाँच उपकरण, एक के नीचे एक पाँच पंक्तियों के रूप में, हर एक पर एक सुनहरा बिंदु: आध्यात्मिक और दार्शनिक शिक्षा, दिन का मूल्य, संकल्पित गतिविधि, वैज्ञानिक पक्ष और Meditation। बाईं ओर सुनहरे रंग का बड़ा अंक 5, जिसके साथ लिखा है “पाँच उपकरण”; दाईं ओर एक सुनहरा कोष्ठक पाँचों पंक्तियों को एक एकीकृत प्रक्रिया के रूप में समेटता है। 5 पाँच उपकरण आध्यात्मिक और दार्शनिक शिक्षादिन का मूल्यसंकल्पित गतिविधिवैज्ञानिक पक्षMeditation एक एकीकृतप्रक्रिया
चित्र 5पाँच उपकरण। बदलाव की एक एकीकृत प्रक्रिया।

TLM में पाँच उपकरणों का तर्क

अब ज़ाहिर-सा सवाल यह उठता है: अगर मूल शिक्षा पहले कुछ दिनों में ही दे दी गई थी, तो TLM ने बीस दिन स्वास्थ्य, संबंधों, मूल्यों, वित्त, पेशे, ध्यान, meditation और neuroscience की बात करने में क्यों लगाए?

यहीं कठ उपनिषद् और भगवद्गीता का प्रसिद्ध रथ-रूपक सामने आता है।

अद्वैत वेदांत की नज़र से, सबसे गहरी परिपूर्णता ऐसी कोई चीज़ नहीं जिसे आत्मा को पाना हो। फिर भी शरीर-मन रूपी साधन को देखभाल, प्रशिक्षण और समझदारी भरे शासन की ज़रूरत रहती है।

रथ पर फिर से नज़र

TLM का पूरा रथ, एक engraving: पाँच घोड़ों से खींचा जा रहा चार पहियों वाला एक प्राचीन भारतीय रथ, जो दाईं ओर बढ़ रहा है; आगे खड़ा एक सारथी लगाम थामे है और उसके पीछे एक यात्री बैठा है; दोनों पीछे से दिखते हैं। लिखे हुए नाम: यात्री — आत्मा, बैठी हुई आकृति पर एक घेरे के साथ सुनहरे रंग में चिह्नित; सारथी — बुद्धि; लगाम — मन; घोड़े — इंद्रियाँ; रथ — शरीर। चारों पहियों पर अक्षरों वाले निशान लगे हैं और चित्र के नीचे उनके नाम दिए गए हैं: स्वास्थ्य (दूर वाला पिछला पहिया), वित्त (पास वाला पिछला पहिया), पेशा (दूर वाला अगला पहिया) और संबंध (पास वाला अगला पहिया)। पूरा रथ H F P R चार पहिए H स्वास्थ्य F वित्त P पेशा R संबंध रथ — शरीर यात्री — आत्मा सारथी — बुद्धि लगाम — मन घोड़े — इंद्रियाँ
चित्र 6यात्रा की quality वाहन की हालत पर निर्भर करती है।

पाँच उपकरण क्यों हैं

TLM के पाँच दैनिक अभ्यास रथ के अलग-अलग हिस्सों को मज़बूत करने के लिए बनाए गए थे। सिर्फ़ जानकारी से बदलाव नहीं हो सकता। इंसान के system के हर हिस्से को train करना होगा।

कुछ अभ्यास मुख्य रूप से इंद्रियों के स्तर पर काम करते हैं।
कुछ मन के स्तर पर काम करते हैं।
कुछ बुद्धि को मज़बूत करते हैं।
कुछ गहरी अवचेतन conditioning पर असर डालते हैं।
कुछ खुद वाहन की हालत सुधारते हैं।

मिलकर ये आंतरिक शासन बनाते हैं।

पाँच उपकरण रथ पर कैसे काम करते हैं

नीचे दिए गए मुख्य targets इस बात का TLM का समझाने वाला model हैं कि हर उपकरण रथ पर और मन की परतों पर कैसे काम करता है; ये प्रयोगों से स्थापित एक-से-एक मिलान नहीं हैं।

1

आध्यात्मिक और दार्शनिक शिक्षा

यह सारथी को दिशा देती है। यह बुद्धि को मज़बूत करती है। प्रज्ञा के बिना सारथी यात्रा का मार्गदर्शन नहीं कर सकता।

मुख्य targetबुद्धि और अवचेतन conditioning
2

दिन का मूल्य (भारतीय ज्ञान-परंपराओं पर आधारित)

मूल्य इंद्रियों को करने या न करने के लिए कुछ ठोस देते हैं। मूल्य धीरे-धीरे मन को शुद्ध करते हैं और उसे align करते हैं। वे भावनात्मक झुकावों और आदतन प्रतिक्रियाओं को बदलते हैं। ज़्यादा मज़बूत मन के सहारे बुद्धि व्यवहार को ज़्यादा असरदार ढंग से दिशा दे पाती है।

मुख्य targetइंद्रियाँ और मन
3

संकल्पित गतिविधि

संकल्पित गतिविधियाँ समझ को व्यवहार में बदलती हैं। वे आदतों और रोज़मर्रा के कामों को train करती हैं। वे अभ्यास के ज़रिए नई conditioning बनाती हैं।

मुख्य targetव्यवहार के patterns और अवचेतन conditioning
4

वैज्ञानिक पक्ष (SQ)

वैज्ञानिक पक्ष psychology और neuroscience के ऐसे नज़रिए सामने रखता है, जो हिस्सा लेने वालों को अभ्यासों के पीछे का तर्क समझने में मदद कर सकते हैं। ज़्यादा समझ प्रतिबद्धता को सहारा दे सकती है, हालाँकि प्रेरणा और अभ्यास पर टिके रहना व्यक्ति और हालात से जुड़ी बातों पर भी निर्भर करता है।

मुख्य targetबुद्धि
5

Meditation

Meditation सभी परतों पर काम करती है। यह धीरे-धीरे अवचेतन conditioning को बदलती है।

मुख्य targetइंसान का पूरा system

TLM की 4-3-5 प्रणाली

4

4 है जीवन-यात्रा — अपने साधनों (शरीर-मन) के साथ यात्री, लक्ष्य, मार्ग और चार पहियों वाला वाहन।

3

3 हैं मन की वे तीन परतें, जिन पर स्थायी बदलाव के लिए काम करना ज़रूरी है।

5

5 हैं वे पाँच उपकरण, जो सिर्फ़ सचेत विचार पर असर नहीं डालते। वे एक साथ इन पर काम करते हैं:

  • स्थूल मन
  • सूक्ष्म मन
  • अवचेतन मन

इसीलिए TLM ज्ञान, चिंतन, कर्म, विज्ञान और meditation को एक साथ जोड़ता है। हर एक उन परतों तक पहुँचता है, जहाँ तक बाकी पूरी तरह नहीं पहुँच पाते। स्थायी बदलाव तब होता है, जब तीनों परतें aligned हो जाती हैं।

TLM का model, तीन जुड़े हुए panels में, जिन्हें ऊपर से नीचे पढ़ा जाता है और जो सुनहरे तीरों से जुड़े हैं। Panel 1, ढाँचा: यात्रा के चार तत्व (यात्री, वाहन, मार्ग, लक्ष्य) और मन की तीन परतें (स्थूल, सूक्ष्म, अवचेतन)। Panel 2, प्रक्रिया: पाँच दैनिक उपकरण (आध्यात्मिक शिक्षा, मूल्य, संकल्पित गतिविधि, SQ, Meditation), जिन्हें एक कोष्ठक समेटता है और एक तीर आंतरिक शासन के सात चरणों (मन को समझना, मन को शांत करना, ध्यान और एकाग्रता को साधना, ध्यान को इच्छानुसार मोड़ना, मन को शुद्ध करना, मन का साक्षी बनना, मन से परे जाना) से जोड़ता है। Panel 3, एकीकृत नतीजा: केंद्र में आंतरिक शासन, जिससे ENA, सक्रिय अनासक्ति, और EVA, सक्रिय मूल्य-निष्ठा, दो सुनहरी किरणों के रूप में निकलते हैं। 1 ढाँचा जीवन-यात्रा (4) और मन की तीन परतें (3) 4 यात्रा के चार तत्व यात्री वाहन मार्ग लक्ष्य 3 मन की तीन परतें स्थूल सूक्ष्म अवचेतन 2 प्रक्रिया पाँच दैनिक उपकरण (5) और आंतरिक शासन के सात चरण 5 पाँच दैनिक उपकरण आध्यात्मिक शिक्षा मूल्य संकल्पित गतिविधि SQ Meditation 7 आंतरिक शासन के सात चरण 1 मन को समझना 2 मन को शांत करना 3 ध्यान और एकाग्रता को साधना 4 ध्यान को इच्छानुसार मोड़ना 5 मन को शुद्ध करना 6 मन का साक्षी बनना 7 मन से परे जाना 3 एकीकृत नतीजा आंतरिक शासन, जो ENA और EVA के ज़रिए व्यवहार में उतरता है आंतरिक शासन ENA सक्रिय अनासक्ति EVA सक्रिय मूल्य-निष्ठा
चित्र 7कई अभ्यास। एक बदलाव।
शिक्षा — भाग 5

आंतरिक शासन के साथ जीना

अब एक स्वाभाविक सवाल उठता है।

अगर परिपूर्णता पूरी तरह बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है, तो हमें दुनिया से कैसे जुड़ना चाहिए?

क्या हमें जीवन से पीछे हट जाना चाहिए?
क्या हमें लक्ष्यों के लिए कोशिश करना छोड़ देना चाहिए?
क्या हमें नतीजों की परवाह करना छोड़ देना चाहिए?

ज्ञान-परंपराओं का जवाब हमेशा एक ही है: नहीं।

जीवन त्यागने के लिए नहीं है। वह समझदारी से जीने के लिए है।

इसलिए TLM आंतरिक शासन के दो व्यावहारिक रूप सामने रखता है: सक्रिय अनासक्ति (ENA) और सक्रिय मूल्य-निष्ठा (EVA)। मिलकर ये भीतर से स्वतंत्र रहते हुए दुनिया में पूरी तरह जीने का एक ढाँचा देते हैं।

आंतरिक शासन के दो पंख, एक engraving: एक हंस, ठीक ऊपर से देखा गया, दोनों पंख फैलाए पृष्ठ पर ऊपर की ओर उड़ता हुआ। बाएँ पंख पर लिखा है ENA, सक्रिय अनासक्ति, नतीजों से हमारा रिश्ता; दाएँ पंख पर EVA, सक्रिय मूल्य-निष्ठा, चुनावों से हमारा रिश्ता। शरीर के बीच में एक सुनहरा घेरा आंतरिक शासन को दिखाता है। ENAसक्रिय अनासक्तिनतीजों से हमारा रिश्ता EVAसक्रिय मूल्य-निष्ठाचुनावों से हमारा रिश्ता आंतरिक शासन
चित्र 8आंतरिक शासन ENA और EVA के ज़रिए ज़ाहिर होता है।

ENA — सक्रिय अनासक्ति

इंसान के दुःख के सबसे बड़े स्रोतों में से एक खुद कर्म नहीं है। वह है नतीजों पर भावनात्मक निर्भरता।

हम अक्सर मानते हैं:

“यह लक्ष्य पा लेने पर मुझे शांति मिलेगी।”
“यह स्थिति बदल जाए, तो मुझे खुशी मिलेगी।”
“जीवन मेरी उम्मीदों के हिसाब से चले, तो मुझे परिपूर्णता मिलेगी।”

इस वजह से, हमारी भावनात्मक हालत उन परिस्थितियों से बँध जाती है, जिन पर हमारा control सिर्फ़ कुछ हद तक होता है।

ENA एक अलग तरीका सामने रखता है।

यह हमसे लक्ष्य छोड़ने को नहीं कहता।
यह निष्क्रियता को बढ़ावा नहीं देता।
यह महत्वाकांक्षा को कम नहीं करता।

बल्कि यह हमें भावनात्मक रूप से स्वतंत्र रहते हुए पूरी तरह सक्रिय रहने के लिए आमंत्रित करता है।

ENAअपनी पूरी कोशिश करें। पूरे मन से जुट जाएँ। ईमानदारी और उत्कृष्टता के साथ कर्म करें।पर अपने मन की शांति नतीजे के हाथों न सौंपें।

जब कर्म आंतरिक शासन से दिशा पाता है, तो हम नतीजों पर भावनात्मक निर्भरता घटाते हुए अपने प्रयास को बनाए रखना सीख सकते हैं। अभ्यास के साथ, इससे resilience, effectiveness और मन की ज़्यादा शांति को सहारा मिल सकता है।

EVA — सक्रिय मूल्य-निष्ठा

अगर ENA इस सवाल का जवाब देता है: “मैं नतीजों से किस तरह का रिश्ता रखूँ?”
तो EVA एक और सवाल का जवाब देता है: “मेरे कर्मों को कौन-सी चीज़ दिशा दे?”

आधुनिक जीवन में अक्सर ऐसी स्थितियाँ आती हैं, जहाँ सही रास्ता तुरंत साफ़ नहीं होता।

नतीजे अनिश्चित होते हैं।
जानकारी अधूरी होती है।
दबाव एक-दूसरे से टकराते हैं।

ऐसे पलों में मूल्य हमारा compass बन जाते हैं।

EVAEVA का मतलब है impulses के बजाय मूल्यों से जीना।सुविधा के बजाय सिद्धांतों से।
पल भर की पसंद के बजाय प्रज्ञा से।

मूल्य मन को align करने, बुद्धि को मज़बूत करने और हम जो मानते हैं और जैसे जीते हैं, उनके बीच तालमेल बिठाने में मदद करते हैं।

मूल्यों के बिना भी सफलता संभव हो सकती है। पर परिपूर्णता पकड़ से बाहर रहती है।

एकीकरण

ENA और EVA अलग-अलग अभ्यास नहीं हैं। वे आंतरिक शासन के पूरक रूप हैं।

ENA

नतीजों से हमारे रिश्ते को regulate करता है।

EVA

चुनावों से हमारे रिश्ते को regulate करता है।

मिलकर ये हमें जीवन में पूरी तरह हिस्सा लेने देते हैं, उसके कैदी बने बिना।

शिक्षा — भाग 6

जीवन-यात्रा की महान परिणति

इस पूरे course में हमने जीवन-यात्रा को एक केंद्रीय रूपक के रूप में इस्तेमाल किया है।

हमने जीवन को चार तत्वों वाली एक यात्रा के रूप में देखा:

  • यात्री
  • वाहन
  • मार्ग
  • लक्ष्य

हममें से ज़्यादातर लोग जीवन को स्वाभाविक रूप से इसी तरह समझते हैं।

हम यहाँ हैं।
लक्ष्य वहाँ है।
यात्रा बीच में है।

और इसलिए हम कोशिश करते हैं, हासिल करते हैं, पाते हैं, सीखते हैं, विकसित होते हैं और आगे बढ़ते हैं। इस समझ में कुछ भी गलत नहीं है। असल में, इंसान के विकास की शुरुआत इसी से होती है।

फिर भी ज्ञान-परंपराएँ हमें एक गहरी संभावना को परखने के लिए आमंत्रित करती हैं।

क्या हो, अगर जिस परिपूर्णता को हम खोजते हैं, वह असल में यात्रा के अंत में न हो?

क्या हो, अगर हम इसलिए खोजते ही जा रहे हैं, क्योंकि हम गलत दिशा में देख रहे हैं?

भगवद्गीता इशारा करती है कि इंसान के लिए उपलब्ध सबसे गहरी परिपूर्णता सिर्फ़ इंद्रियों के ज़रिए नहीं मिलती। कृष्ण इसे ऐसे सुख के रूप में बताते हैं, जो इंद्रियों से परे है और निखरी हुई बुद्धि से पहचाना जाता है।

अलग-अलग ज्ञान-परंपराएँ अपने सबसे ऊँचे ध्येय को अलग-अलग ढंग से बताती हैं। उनके concepts को एक जैसा नहीं मानना चाहिए, लेकिन वे हमें स्वतंत्रता, परिपूर्णता और स्व के स्वरूप को परखने के लिए आमंत्रित करती हैं।

  • आनंद
  • निर्वाण
  • कैवल्य
  • मोक्ष
  • मुक्ति
  • संबोधि
  • आत्म-साक्षात्कार
  • आंतरिक स्वतंत्रता

हालाँकि ये परंपराएँ लक्ष्य की अपनी दार्शनिक समझ में एक-दूसरे से अलग हैं, फिर भी वे हमें इस सोच से आगे देखने के लिए आमंत्रित करती हैं कि स्थायी परिपूर्णता पूरी तरह बाहर से कुछ पाने पर निर्भर है।

हम सबसे गहराई से जिसे खोजते हैं, वह कोई चीज़ नहीं है।
न कोई उपलब्धि।
न कोई संपत्ति।
न भविष्य की कोई घटना।

वह होने की एक अवस्था है।

इसका यह मतलब नहीं कि बाहरी यात्रा महत्वपूर्ण नहीं रह जाती।

स्वास्थ्य अब भी मायने रखता है।
संबंध अब भी मायने रखते हैं।
उद्देश्य अब भी मायने रखता है।
सेवा अब भी मायने रखती है।

वाहन की देखभाल अब भी करनी होगी।
मार्ग पर अब भी चलना होगा।
जीवन को अब भी पूरी तरह जीना होगा।

लेकिन कुछ गहरा बदल जाता है। हम अब दुनिया से वह देने की उम्मीद नहीं करते, जो सिर्फ़ आंतरिक विकास ही सामने ला सकता है।

यात्रा पूर्णता की खोज नहीं रह जाती। वह पूर्णता की अभिव्यक्ति बन जाती है।

TLM का बदलाव

इस course में पहले हमने इस क्रम को समझा था:

सुख

ज़्यादातर लोग शुरुआत अनुकूल परिस्थितियों के ज़रिए सुख खोजने से करते हैं।

शांति

जैसे-जैसे आंतरिक शासन विकसित होता है, वे बढ़ती हुई शांति पाते हैं।

आनंद

जैसे-जैसे समझ और गहरी होती है, एक ऐसी परिपूर्णता को पहचानने की संभावना उभरती है, जो परिस्थितियों पर बिलकुल भी निर्भर नहीं है।

ज्ञान-परंपराएँ इसी की ओर इशारा करती हैं।

जीवन से पीछे हटना नहीं।
ज़िम्मेदारी से बचना नहीं।
बल्कि भागीदारी के बीच स्वतंत्रता।

निर्भरता के बिना सक्रियता।बंधन के बिना कर्म।Anxiety के बिना उद्देश्य।आसक्ति के बिना उपलब्धि।

अंतिम अंतर्दृष्टि

यहीं से हम एक अंतिम अंतर्दृष्टि पर पहुँचते हैं।

यात्रा की शुरुआत में यात्री, मार्ग और लक्ष्य अलग-अलग दिखाई देते हैं।

एक यात्री है, जो किसी मंज़िल तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है।
प्रयास है।
संघर्ष है।
कुछ बनते जाने का क्रम है।

लेकिन जैसे-जैसे समझ गहरी होती है, यह ऊपर से दिखने वाली दूरी घटने लगती है। यात्री पाता है कि जिस परिपूर्णता को वह खोज रहा था, वह असल में कभी अनुपस्थित थी ही नहीं। वह भटकाव, conditioning और गलत समझ से ढकी हुई थी।

शांत ताल, एक engraving: पीछे से दिखता यात्री एक शांत ताल के पास वाले किनारे पर पालथी मारकर बैठा है; अपनी लाठी और झोला उसने पास में रख दिए हैं; सड़क घूमती हुई दाईं ओर दूर चली जाती है। दूर क्षितिज पर एक सुनहरा सूरज टिका है, जिस पर लिखा है “जहाँ हमने उसे खोजा”। उसकी रोशनी का प्रतिबिंब यात्री के ठीक बगल में पानी में पड़ा है और एक हल्की सुनहरी रोशनी यात्री के दाएँ हिस्से और कंधों को घेरे हुए है, जिस पर लिखा है “जहाँ वह हमेशा से था”: यात्री जिसकी ओर चल रहा था, वह पहले से यहीं है। जहाँ हमने उसे खोजा जहाँ वह हमेशा से था
चित्र 9यात्री जिस रोशनी की ओर चल रहा था, वह हमेशा से यहीं थी, बस देखे जाने के इंतज़ार में।

लक्ष्य कहीं और नहीं था।
वह आँखों के सामने ही छिपा था।
दूर नहीं।
बस अनदेखा।

और इसलिए यात्रा की अंतिम गति कुछ पाने की ओर नहीं है। वह पहचानने की ओर है।

कुछ बनना नहीं।बल्कि खोज लेना।
कुछ नया जोड़ना नहीं।बल्कि उसे उजागर करना, जो हमेशा से मौजूद रहा है।
समापन

चिंतन

TLM के शिक्षा वाले भाग को पूरा करने की तैयारी करते हुए, रुकें और चिंतन करें:
  1. इस यात्रा के दौरान सुख के बारे में कौन-सी सोच बदली है?
  2. आंतरिक शासन के कौन-से पहलू आपमें सबसे ज़्यादा मज़बूत हुए हैं?
  3. आंतरिक शासन के सात चरणों में से किस पर आपको लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है?
  4. आप अब भी कहाँ मुख्य रूप से बाहरी परिस्थितियों के ज़रिए परिपूर्णता खोजते हैं?
  5. अगर जीवन परिपूर्णता की खोज के बजाय परिपूर्णता की अभिव्यक्ति बन जाए, तो क्या बदल जाएगा?

इन सवालों का जवाब तुरंत देने की ज़रूरत नहीं है। इन्हें अपने साथ रहने दें।

कुछ सवाल हल नहीं किए जाते। उन्हें जिया जाता है।

Meditation की ओर

इस meditation का उद्देश्य कुछ नया हासिल करना नहीं है। उद्देश्य बस इस संभावना में ठहरना है कि हम सबसे गहराई से जिसे खोजते हैं, वह शायद कहीं और न हो। वह शायद पहले से ही मौजूद हो, पहचाने जाने के इंतज़ार में।

और अगर ऐसा है, तो शायद अपने और जीवन के बीच जो अलगाव हम आदतन अनुभव करते हैं, वह उतना पूर्ण नहीं है जितना दिखता है।

प्राणायाम — उज्जायी breathing 4:4:6:2
Meditation — Loving-Kindness Meditation
Guided audio — 15 मिनट
Meditation audio चलाएँ, आराम से बैठें और बस अभ्यास करें।

Guided अभ्यास के लिए course की meditation recording का इस्तेमाल करें। नीचे दिया गया timer अकेले अभ्यास करते समय आपका शांत साथी है।

चिंतन

यात्री के लिए notes

उन पाँच सवालों के लिए एक पृष्ठ, जिनके साथ जीना है

इस यात्रा के दौरान सुख के बारे में कौन-सी सोच बदली है?

आंतरिक शासन के कौन-से पहलू आपमें सबसे ज़्यादा मज़बूत हुए हैं?

आंतरिक शासन के सात चरणों में से किस पर आपको लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है?

आप अब भी कहाँ मुख्य रूप से बाहरी परिस्थितियों के ज़रिए परिपूर्णता खोजते हैं?

अगर जीवन परिपूर्णता की खोज के बजाय परिपूर्णता की अभिव्यक्ति बन जाए, तो क्या बदल जाएगा?